माया

 

 

 

     क्यों दौड रहा है किसी परछाइ के पीछे?

आगे तो ज़रा देख वो छाया तो नहीं है?

 

           इतना तो न बन अँध, ओ नादान मुसाफिर !

        क्या है ये हक़िकत या कि माया तो नहि है?

 

             जिसको तु समज़ता है हमेंशा से ही अपना।

     तेरा ही है या और-पराया तो नहिं है?

 

               जुगनु की चमक देख के खिंचता चला है तु,

                ये तुज़को दिखाने को सजाया तो नहिं है?

 

                       सहेरा में कहीं बहता है पानी अरे “रज़िया” !

                   धोख़ा है समज़ ये तो बहाया ही नहिं है?

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मुस्कुराता तू चलाजा

 

 

 

आदमी है, आदमी से मिल मिलाता तू चलाजा।

गीत कोइ प्यार के बस गुनगुनाता तू चलाजा।

 

 

गर तुझे अँधियारा राहों में मिले तो याद रख़,

हर जगह दीपक उजाले के जलाता तू चलाजा।

 

 

जो तुझे चूभ जायें काँटे, राह में हो बेखबर,

अपने हाथों से हटा कर, गुल बिछाता तू चलाजा।

 

 

सामने तेरे ख़डी है जिंदगानी देख ले,

बीती यादों को सदा दिल से मिटाता तू चलाजा।

 

राज़ हम आये हैं दुनिया में ही ज़ीने के लिये।

हँस के जी ले प्यार से और मुस्कुराता  तू चलाजा।

माँ की लोरियाँ

 

 

 

कानों में गुनगुनातीं हैं वो माँ की लोरियाँ।
बचपन में ले के जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

लग जाये जो कभी किसी अनजान सी नज़र,
नजरें उतार जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

भटकें जो राह हमारा कभी अपनों के साथ से,
आके हमें मिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

हो ग़मज़दा जो दिल कभी करता है याद जब,
हमको बड़ा हँसाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

अफ़्सुर्दगी कभी हो या तनहाई हो कभी,
अहसास कुछ दिलाती है वो माँ की लोरियाँ।

पलकों पे हाथ फ़ेरके ख़्वाबों में ले गइ,
मीठा-मधुर गाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

दुनिया के ग़म को पी के जो हम आज थक गये,
अमृत हमें पिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

माँ ही हमारी राहगीर ज़िंदगी की है,
जीना वही सिखाती है वो माँ की लोरियाँ।

अय “राज़” माँ ही एक है दुनिया में ऐसा नाम,
धड़कन में जो समाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

मौसम

                     

आया मौसम बड़ा ही सुहाना।(2)

ले के आया है कोई ख़ज़ाना।…आया मौसम…

 

आसमॉं पे है बदरी जो छाई,

जैसे काली-सी चादर बिछाई।

डूबा मस्ती में सारा ज़माना।हो…(2)

 ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

 

 आज बादल से बरख़ा गीरी है।

 सुख़ी धरती को ठंडक मिली है।

 कैसे निकला है धरती से दाना हो..(2)

ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

आज बरख़ा ने सब को भिगोया।

धूल-मिट्टी को पेड़ों से धोया।

कहे के भूलो हुवा ये पुराना हो..(2)

ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

सारे पंछी भी गाने लगे है।               

सारे प्राणी नहाने लगे है।

मोर-पपीहा हुवा है दीवाना हो…(2)

                 ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

नन्हें बच्चों ने कश्ती बनाई।

बहते पानी में उसको चलाइ।

और छेड़ा है कोई तराना हो..(2)

                 ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

आओ हम भी ये मस्ती में झुमे।

गिरती बारिश की बुंदों को चुमें।

‘राज़’ तुम भी करो कुछ बहाना हो..(2)

                 ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…

 

 

 

            

 

 

 

 

 

 

 

हज़ारों नाम वाले

 

   दाता तेरे हज़ारों है नाम…(2)

कोइ पुकारे तुज़े कहेकर रहिम,

 और कोइ कहे तुज़े राम।…दाता(2)

 

क़ुदरत पर है तेरा बसेरा,

सारे जग पर तेरा पहेरा,

तेरा ‘राज़’बड़ा ही गहेरा,

तेरे ईशारे होता सवेरा,

तेरे ईशारे हिती शाम।…दाता(2)

 

ऑंधी में तुं दीप जलाये,

पथ्थर से पानी तुं बहाये,

बिन देखे को राह दिख़ाये,

विष को भी अमृत तु बनाये,

तेरी कृपा हो घनश्याम।…दाता(2)

 

 क़ुदरत के हर-सु में बसा तु,

पत्तों में पौन्धों में बसा तु,

नदीया और सागर में बसा तु,

दीन-दु:ख़ी के घर में बसा तु,

फ़िर क्यों में ढुंढुं चारों धाम।…दाता(2)

 

 ये धरती ये अंबर प्यारे,

चंदा-सुरज और ये तारे,

पतज़ड हो या चाहे बहारें,

दुनिया के सारे ये नज़ारे,

 देख़ुं मैं ले के तेरा नाम।…दाता(2)

 

 

ज़िंदगी

 

ज़िंदगी

 

 

ज़िंदगी तूने बसाया अपनी ये आग़ोश में।

ज़िंदगी तूने समाया अपनी ये आग़ोश में।

 

मरसिये ग़म के कभी तो खुशीयों के गाने यहां।

वाह क्या क्या है सूनाया, अपनी ये आग़ोश में।

 

तूने जो चाहा, सराहा, अपनी मरज़ी से यहां।

झांसा देकर यूँ हंसाया अपनी ये आग़ोश में।

 

फ़ल्क़ पर ले जा बिठाया, या गिराया रेत पर।

तूने जी चाहा उठाया, अपनी ये आग़ोश में।

 

तेरी ही मरज़ी यहां चलती रही है ज़िंदगी।

तूने ही सब कुछ दिलाया, अपनी ये आग़ोश में।

 

हम बने माटी से है, हम पे हमारा जोर क्या?

 तूने हमको है बनाया, अपनी ये आग़ोश में।

 

ज़िंदगी तू भी न जाने क्या लकीरें दे गई?

है बनाया और मिटाया, अपनी ही आग़ोश में।

 

 राज़ अब तो क्या शिकायत ज़िंदगी से  है तुम्हें?

तुम ये गिनलो क्या है पाया, अपनी ये आग़ोश में?

 

 

कारवॉ

        कारवॉ

 

 

मेरे पंख मुज़से न छीनलो,

 मुझे आसमॉ की तलाश है।

मैं हवा हूँ मुझको न बॉधलो ,

मुझे ये समॉ की तलाश है।

 

 

मुझे मालोज़र की ज़रुर क्या?

मुझे तख़्तो-ताज न चाहिये !

जो जगह पे मुज़को सुक़ुं मिले,

मुझे वो जहाँ की तलाश है।

 

 

मैं तो फ़ुल हूं एक बाग़ का।

मुझे शाख़ पे बस छोड दो।

में खिला अभी-अभी तो हूं।

मुझे ग़ुलसीतॉ की तलाश है।

 

 

न हो भेद भाषा या धर्म के।

न हो ऊंच-नीच या करम के।

जो समझ सके मेरे शब्द को।

वही हम-ज़बॉ की तलाश है।

 

जो अमन का हो, जो हो चैन का।

जहॉ राग_द्वेष,द्रुणा न हो।

पैगाम दे हमें प्यार का ।

वही कारवॉ की तलाश है।

 

 

 

 

 

याद है

        

 

वक़्त ने साथ छोड़ा हमारा जो था,

हाय तेरा, तड़पना मुझे याद है।

मुंह छिपाकर तेरा मेरी आगोश में,

हाय कैसा बिलख़ना मुझे याद है।…हॉ मुझे याद है।

 

 प्यार की वादीओ में गुज़ारे जो पल,

कैसे दिल से ओ साथी भूला पायेंगे?

जिन लकीरों पे कस्मे जो खाइ थीं कल,

आज हम वो लकीरें मिटा पायेंगे?

 उन रक़ीबों के ज़ुल्मों को मेरे सनम,

हाय तेरा वो सहेना मुझे याद है। हॉ मुझे याद है।

 

 ख्वाब हमने सज़ाये थे मिलकर सनम।

एक घरौंदा सुनहरा बनायेंगे हम।

साथ तेरा रहे, साथ मेरा रहे।

हमने ख़ाईं थीं इक-दूसरे की कसम|

 उन वफ़ाओं की राहों में मेरे सनम,

आज भी सर ज़ुकाना मुझे याद है। हॉ मुझे याद है.

 

 क्या करें मेरे महबूब अय जानेमन!

हम भी वक़तों के हाथों से मजबूर हैं।

ना नसीबा ही अपना हमें साथ दे।

ईसलीये  ही तो हम आज यूं दूर है।

 हिज्र के वक़्त में ओ मेरे हमसुख़न।

आज तेरा सिसकना मुझे याद है। हॉ मुझे याद है.

 

हाय चलती हवाओं उसे थाम लो।

ठंडी-ठंडी फ़िज़ाओ मेरा नाम लो।

सर से उस के जो पल्लू बिख़र जायेगा,

आहें भर के ये माशुक़ मर जायेगा।

याद जब जब करेंगे हमें राज़ तब।

हाय मेरा तड़पना मुझे याद है।

 

मक़डी का जाल

                                   हिंमत हारा बैठा था में,

पीठ फिराये भविष्य से।

 

हार चुका था अपनी शक्ति,

अपनी ही कमजोरी से ।

 

 

देखा मैंने एक मकड़ी को,

बार बार  यूँ गिरते हुए।

 

अपने बुने हुए जाल पे फिर भी,

कंई बार जो सँभलते हुए।

 

 

गिरती रही, सँभलती रही पर..

बुनती रही वो अपना जाल।

 

पुरा बन चुकने पर मकडी,

जैसे हो गइ हो निहाल।

 

 

एक छोटी मक़्डी ने मुझ में,

भर दी हिंमत कंई अपार।

 

कुछ करने की ठान ली मैंने,

अब ना रहा मैं यूँ लाचार।

 

 

मक़डी ने सिखलाया मुज़को,

हरदम कोशिश करते रहना।

 

राज़ कितनी बाधाएं आयें,

हरदम कदम बढाये रहना।

बचपन


बचपन हॉ हॉ ये बचपन।
नादान भोला ये बचपन।
कहीं ऑसु से भीगा ये बचपन।
कहीं पैसों में भीगा ये बचपन।
धूल-मिट्टी में खोया ये बचपन।
फ़ुटपाथसडक पर संजोया ये बचपन।
रेंकडी पर जुतों की पोलिश पर चमकता ये बचपन।
कहीं कुडेदान में खेलता ये बचपन।
कहीं गरम सुट में घुमता ये बचपन।
कहीं फ़टे कपडों में नंगा घुमता ये बचपन।
 कहीं मर्सीडीज़ कारों में घुमता ये बचपन।
कहीं कारो  केशीशे पोंछता  ये बचपन।
कहीं मेगेज़ीन बेचता ये बचपन।
कही  महेलों में   ज़ुलता ये बचपन।
कहीं फ़टी साडी में ज़ुलता ये बचपन।
कहीं केडबरीज़ के  रेपर में खोया ये बचपन।
कहीं सुख़ी रोटी की पोलीथीन में खोया ये बचपन।
कहीं एरोड्राम पर टहलता ये बचपन।
कहीं नट बनकर दोरी पर चलता ये बचपन।
पर……
कहीं बाई के हाथों में पलता ये बचपन।
तो कहीं ममता की छाया में संभलता ये बचपन।
बचपन हॉ हॉ ये बचपन।

पैग़ाम

 

                              

 

 

देख़ो लोगों मेरे जाने का है पैग़ाम आया..(2)

ख़ुदा के घर से है ये  ख़त, मेरे नाम आया….देख़ो लोगो…

 

जिसकी ख़वाहिश में ता-जिन्दगी तरसते रहे।

वो तो ना आये मगर मौत का ये जाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

ज़िंदगी में हम चमकते रहे तारॉ की तरहॉ ।

रात जब ढल गइ, छुपने का ये मक़ाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

राह तकते रहे-ता जिन्दगी दिदार में हम |

ना ख़बर आइ ना उनका कोइ सलाम आया । ख़ुदा के घर…..

 

चल चुके दूर तलक मंज़िलॉ की खोज में हम।

अब बहोत थक गये रुकने का ये मक़ाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

हम मुहब्बत् में ज़माने को कुछ युं भूल गये ।

हम है दिवाने, ज़माने का ये इल्ज़ाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

जिसने छोडा था ज़माने में युं तन्हा रज़िया

क़ब्र तक छोड़ने वो क़ाफ़िला तमाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

यादें

यादें

पीछे मुड के हमने जब देख़ा ,गुज़रा वो ज़माना याद आया।

बीती एक कहानी याद आइ, बीता एक फ़साना याद आया।…..पीछे.

सितारों को छूने की चाहत में, हम शम्मे मुहब्बत भूल गये।(2)

जब शम्मा जली एक कोने में, हम को परवाना याद आया।…..पीछे.

शीशे के महल में रहकर हम, तो हँसना-हँसाना भूल गये।(2)

पीपल की ठंडी छाँव तले वो हॅसना-हॅसाना याद आया।…..पीछे.

दौलत ही नहीं ज़ीने के लिये, रिश्ते भी ज़रूरी होते है।(2)

दौलत ना रही जब हाथों में, रिश्तों का खज़ाना याद आया।…..पीछे.

शहरॉ की ज़गमग-ज़गमग में, हम गीत वफ़ा के भूल गये।(2)

सागर की लहरॉ पे हमने, गाया था तराना याद आया।…..पीछे.

चलते ही रहे चलते ही रहे, मंजिल का पता मालूम न था।(2)

वतन की वो भीगी मिट्टी का अपना वो ठिकाना याद आया।…..पीछे.

अपनॉ ने हमें कमज़ोर किया, बाबुल वो हमारे याद आये।(2)

कमज़ोर वो ऑखॉ से उन को वो अपना रुलाना याद आया।…..पीछे.

अय “राज़” कलम तुं रोक यहीं, वरना हम भी रो देंगे।(2)

तेरी ये गज़ल में हमको भी कोइ वक़्त पुराना याद आया।…..पीछे.