कलम

pen

है बड़ा उसमें जो दम।

चल पडे उसके कदम।

देखो क्या करती कलम।

कभी होती है नरम।

कभी होती है गरम।

देखो क्या करती कलम।

छोड देती है शरम।

खोल देती है भरम।

देखो क्या करती कलम।

कभी देती है ज़ख़म।

कभी देती है मरहम।

देखो क्या करती कलम।

कभी लाती है वहम।

कभी लाती है रहम।

देखो क्या करती कलम।

कभी बनती है नज़म।

कभी बनती है कसम।

देखो क्या करती कलम।

लिख्नना है उसका धरम।

चलना है उसका करम।

देखो क्या करती कलम।

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क्यों कैसी रही!!!

क्यों कैसी रही? आज?

बड़ा ग़ुरूर था अपने आप पर!!

आज नर्म हो गये ना?

वक़्त कब और कैसे अपना रुख़ बदलेगा किसी को पता नहिं है।

और फ़िर अहंकार तो सबसे बूरी बात है।

सब कोइ कहता था कि आप से ही मैं हुं।

आप के बिना मेरा कोइ वज़ुद नहिं।

मैं हमेशाँ ख़ामोश रहा।

या कहो कि मेने भी स्वीकार कर लिया था कि आप के आगे मैं कुछ भी नहिं।

लोग कहते थे कि मेरा मिज़ाज ठंडा है और आप का गर्म।

ख़ेर मैं चुपचाप सुन लिया करता था क्योंकि आप की गर्मी से मैं भी तो डरता था।

भाइ में छोटा हुं ना!

पर आज मैं तुम पर हावी हो गया सिर्फ दो घंटों के लिये ही सही।

सारी दुनिया ने देख़ा कि आज तुम नर्म थे छुप गये थे एक गुनाहगार कि तरहाँ।

थोडी देर के लिये तो मुज़े बड़ा होने दो भैया!

पर एक बात कहुं मुज़े आप पर तरस आ रहा था जब लोग तमाशा देख रहे थे तब!

मैं आप पर हावी होना नहिं चाहता था।

पर मैं क्या करता क़ुदरत के आगे किसी का ना चला है ना चलेगा।

बूरा मत लगाना।

देख़ो आज आप पर आइ इस आपत्ति के लिये सभी दुआ प्रार्थना करते है।

लो मैने अपनी परछाई को आप पर से हटा लिया।

आपको छोटा दिखाना मुज़े अच्छा नहिं लगा।

क्योंकि मैं “चंदा” हुं और तुम “सुरज”।

किनारे छूट जाते है

timeबूरा जब वक़्त आता है, सहारे छूट जाते हैं।
जो हमदम बनते थे हरदम, वो सारे छूट जातेहै।

बड़ा दावा करें हम तैरने का जो समंदर से,
फ़सेँ जब हम भँवर में तो, किनारे छूट जाते है।

जो चंदा को ग्रहण लग जाये, सूरज साथ छोडे तो,
वो ज़गमग आसमाँ के भी सितारे छूट जाते है।

जिन्हें पैदा किया, पाला, बडे ही चाव से हमने।
जवानी की उडानों में, दूलारे छूट जाते है।

जो दिल में दर्द हो ग़र्दीश में जीवन आ गया हो तब,
कभी लगते थे वो सुंदर, नज़ारे छूट जाते है।

जो दौलत हाथ में हो तब, पतंगा बन के वो घूमे,
चली जाये जो दौलत तो वो प्यारे छूट जाते है।

मुसीबत में ही तेरे काम कोइ आये ना ‘रज़िया”
यकीनन दिल से अपने ही हमारे छूट जाते है।

इरशाद न कर

 

         जो चला वक्त  उसी वक्त को तूँ याद न कर।

बीती पलकों में यूं ही जिन्दगी बरबाद न कर।

 भूल जा भुले हुए रिश्तों को जो छोड़ चले।

उनकी यादों की ज़हन में बडी तादाद न कर।

 ना मिलेगा तुज़े ये बात कहेगा सब को।

अपने दर्दों की परायों से तुं फरियाद न कर।

 जो नहिं उसके ख़ज़ाने में तुज़े क्या देगा?

ना दिलासा ही सही उससे युं इमदाद न कर।

 राज़जब कोई गज़ल छेड दे ज़ख़्मों को तेरे।

तुं उसी शेर के शायर को ही इरशाद न कर।

 

 

 

 

 

 
 

 

 

  

माँ

 

 

 

 

 

मेरी ख़ामोशीओं की गुंज सदा देती है।

तू सुने या ना सुने तुज़को दुआ देती है।

 मैंने पलकों में छुपा रख्खे थे आँसू अपने।(2)

रोकना चाहा मगर फ़िर भी बहा देती है।

 मैंने पाला था बड़े नाज़-मुहब्बत से तुझे(2)

क्या ख़बर जिंदगी ये उसकी सज़ा देती है।

 तूँ ज़माने की फ़िज़ाओं में कहीं गुम हो चला(2)

तेरे अहसास की खुशबू ये हवा देती है।

 तूँ कहीं भी रहेअय लाल मेरे दूरी पर(2)

दिल की आहट ही मुझे तेरा पता देती है।

 

 

 
 
 
 

 

 

तरसना कैसा?

ज़ाम जब पी ही लिया है तो सँभलना कैसा?

समंदर सामने है फ़िर अपना  तरसना कैसा?

 

 

ख़ुलके जी लेते है वों फ़ुल भी कुछ पल के लिये।

हम भी जी लें ये बहारों में सिमटना कैसा?

 

 

ख़ुदको चट्टान की मजबूती से तोला था कभी !

तो क्यों ये मोम बने तेरा पिघलना कैसा?

 

 

सामने राह खुली है तो चलो मंजिल तक।

कारवाँ बनके बया बाँ में भटकना कैसा?

 

 

न कोइ भूल ना गुनाह हुवा है तुज़से,

देखकर आईना तेरा ये लरजना कैसा?

 

 

दस्तखत कोइ नहिं जिंदगी के पन्नों पर।

राज़ दिल ये तो बता तेरा धड़कना कैसा?

 

मुस्कुराता तू चलाजा

 

 

 

आदमी है, आदमी से मिल मिलाता तू चलाजा।

गीत कोइ प्यार के बस गुनगुनाता तू चलाजा।

 

 

गर तुझे अँधियारा राहों में मिले तो याद रख़,

हर जगह दीपक उजाले के जलाता तू चलाजा।

 

 

जो तुझे चूभ जायें काँटे, राह में हो बेखबर,

अपने हाथों से हटा कर, गुल बिछाता तू चलाजा।

 

 

सामने तेरे ख़डी है जिंदगानी देख ले,

बीती यादों को सदा दिल से मिटाता तू चलाजा।

 

राज़ हम आये हैं दुनिया में ही ज़ीने के लिये।

हँस के जी ले प्यार से और मुस्कुराता  तू चलाजा।

माँ की लोरियाँ

 

 

 

कानों में गुनगुनातीं हैं वो माँ की लोरियाँ।
बचपन में ले के जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

लग जाये जो कभी किसी अनजान सी नज़र,
नजरें उतार जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

भटकें जो राह हमारा कभी अपनों के साथ से,
आके हमें मिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

हो ग़मज़दा जो दिल कभी करता है याद जब,
हमको बड़ा हँसाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

अफ़्सुर्दगी कभी हो या तनहाई हो कभी,
अहसास कुछ दिलाती है वो माँ की लोरियाँ।

पलकों पे हाथ फ़ेरके ख़्वाबों में ले गइ,
मीठा-मधुर गाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

दुनिया के ग़म को पी के जो हम आज थक गये,
अमृत हमें पिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

माँ ही हमारी राहगीर ज़िंदगी की है,
जीना वही सिखाती है वो माँ की लोरियाँ।

अय “राज़” माँ ही एक है दुनिया में ऐसा नाम,
धड़कन में जो समाती हैं वो माँ की लोरियाँ।

बचपन


बचपन हॉ हॉ ये बचपन।
नादान भोला ये बचपन।
कहीं ऑसु से भीगा ये बचपन।
कहीं पैसों में भीगा ये बचपन।
धूल-मिट्टी में खोया ये बचपन।
फ़ुटपाथसडक पर संजोया ये बचपन।
रेंकडी पर जुतों की पोलिश पर चमकता ये बचपन।
कहीं कुडेदान में खेलता ये बचपन।
कहीं गरम सुट में घुमता ये बचपन।
कहीं फ़टे कपडों में नंगा घुमता ये बचपन।
 कहीं मर्सीडीज़ कारों में घुमता ये बचपन।
कहीं कारो  केशीशे पोंछता  ये बचपन।
कहीं मेगेज़ीन बेचता ये बचपन।
कही  महेलों में   ज़ुलता ये बचपन।
कहीं फ़टी साडी में ज़ुलता ये बचपन।
कहीं केडबरीज़ के  रेपर में खोया ये बचपन।
कहीं सुख़ी रोटी की पोलीथीन में खोया ये बचपन।
कहीं एरोड्राम पर टहलता ये बचपन।
कहीं नट बनकर दोरी पर चलता ये बचपन।
पर……
कहीं बाई के हाथों में पलता ये बचपन।
तो कहीं ममता की छाया में संभलता ये बचपन।
बचपन हॉ हॉ ये बचपन।

मुसाफिरख़ाना

 

 

 

 

  

    दुनिया एक मुसाफिरख़ाना है,कभी आना है, कभी जाना है।

    कोई मिलते है,कोई बिछडते है,यही तो एक अफसाना है।…दुनिया

 

    हम काम करें ये कुछ ऐसे कि लोग हमें भी याद करें।

    कोई याद करें जाने के बाद, यही बड़ा नज़राना है।…दुनिया

 

    कुछ पल यहां सुख के आते है, कुछ पल दु:ख के भी आते है।

 इस दु:ख-सुख के ही समय में हमें, कभी रोना, फिर हस जाना है।…दुनिया

 

कभी गर्म धूप होती है यहां, कभी सर्द छॉव की ठंडी यहां।  

इस धूप-छॉव के मौसम में, कभी बदली बन बरस जाना है।…दुनिया

 

 

 कभी तेज़ हवाऎ चलती है,सागर भी मौजें लेता है।

इन ऑधी और तुफानों में,हमे नैया पार लगाना है।…दुनिया

 

 कभी बचपन है ,कभी यौवन है, कमज़ोर बुढापा यहां कभी,

 जीवन की इस बगीया में कभी, बहार, पतज़ड आना है।…दुनिया

 

दर्पण

 

जाने कैसा ये बंधन है?

उजला तन और मैला मन है।

एक हाथ से दान वो देता।

दूजे से कंइ जानें लेता।

रहता बन के दोस्त सभी का।

पर ये तो उनका दुश्मन है।

इन्सानो के भेष में रहता।

शैतानों से काम वो करता।

बन के रहता देव सभी का।

पर ना ये दानव से कम है।

चाहे कितने भेष बनाये।

चाहे कितने भेद छुपाये।

राज़ उसके चेहरे में क्या है?

देखो सच कहता दर्पण है।