वजुद

Ammi  aur main

मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे जाने पर।

में चुराकर लाई हुं तेरे हा थों के वो रुमाल जिससे तूं अपना चहेरा पोंछा करती थी।

मैं चुराकर लाई हुं वो तेरे कपडे जो तुं पहना करती थी।

मैं चुराकर लाई हुं पानी का वो प्याला, जो तु हम सब से अलग छूपाए रख़ती थी।

मैं चुराकर लाई हुं वो बिस्तर, जिस पर तूं सोया करती थी।

मैं चुराकर लाई हुं कुछ रुपये जिस पर तेरे पान ख़ाई उँगलीयों के नशाँ हैं।

मैं चुराकर लाई हुं तेरे सुफ़ेद बाल, जिससे मैं तेरी चोटी बनाया करती थी।

जी चाहता है उन सब चीज़ों को चुरा लाउं जिस जिस को तेरी उँगलीयों ने छुआ है।

हर दिवार, तेरे बोये हुए पौधे,तेरीतसबीह , तेरे सज़दे,तेरे ख़्वाब,तेरी दवाई, तेरी रज़ाई।

यहां तक की तेरी कलाई से उतारी गई वो, सुहागन चुडीयाँ, चुरा लाई हुं “माँ”।

घर आकर आईने के सामने अपने को तेरे कपडों में देख़ा तो,

मानों आईने के उस पार से तूं बोली, “बेटी कितनी यादोँ को समेटती रहोगी?

मैं तुझ में तो समाई हुई हुं।

“तुं ही तो मेरा वजुद है बेटी”

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उज़डा शहर

                                         

 

ये शहर अब वों शहर नहीं,

 न जाने किसकी नज़र लगी?(2)

      

यहॉ झिलमिलाते चिराग थे,

यहॉ टिमटिमाते सितारे थे।

यहॉ रोज़ दिन में ईद थी,

यहॉ रात एक दीवाली थी।

अब यहॉ अमास का आसमॉ।…. न जाने किसकी नज़र लगी?(2)

 

यहॉ ऊंचे मकान थे,

कभी इस में भी इन्सान थे।

यहॉ महेफिलॉ में थी रोशनी,

यहॉ बज़ती थी हर रागिनी।

अब यहॉ है खंडहर के नशॉ।…. न जाने किसकी नज़र लगी?(2)

 

यहॉ बागों में तो बहार थी।

यहॉ तितलीयॉ भी हज़ार थी।

ये सँवरता था दुल्हन तरहॉ,

ये महकता था गुलशन तरहॉ।

अब यहॉ लगा उज़डा समॉ।…. न ज़ाने किसकी नज़र लगी?(2)

 

हमारा घर

हमारा घर

मेरा घर, हमारा घर, हम सब का घर।

बडी, मंझली, छोटी और मुन्ने का घर

 

जहाँ हम पले, जहाँ हमने अपनी पहली सांस ली।

जिसमें हमारा वजुद बना।

जिस से हमारे ताने-बाने जुडे हुए थे,

वो हमारा घर।

पर आज….हमारे उसी घर को,

घेर रख़ा है दिमक ने।

दिमक ने अपना जाल खूब फैला रख़ा है,

हमारे उसी घर पर।

लोग कहते हैं निकाल दो इस घर को

पर कैसे? कैसे निकाल सकते हैं हम इसे?

इस से जो हमारी मा जुडी है।

उसका इस घर से पच्च्त्तर साल का नाता है।

और फिर वो कमझोर भी तो है।

उस बेचारी को तो पता भी नहीं कि..

दिमक ने घेर रख़ा है उसके घर को।

पर हाँ…!इलाज जारी है, दिमक के फैलते हुए जाल को

रोकने का…।

किमोथेरेपी और रेडिएशन के ज़रीए।

 

ताकि बच जाए हमारी माँ

 

अय धूप की किरन!

अय धूप की किरन!

तू हर सुबह मेरे घर की खिड़की पर दस्तक देती थी.

छोटी-छोटी किवाडों से मेरे घर में चली आया करती थी.

मैं चिलमन लगा देती फिर भी तू चिलमनो से झांक लिया करती.

तेरी रोशनी चुभती थी मेरी आंखों में,मेरे गालों पर,मेरी पेशानी पर,

मैं तुझे छुपाने कि कोशिश करती थी कभी किताबों के पन्नों से तो

कभी पुरानी चद्दरों से.लेकिन…..

ऎ किरन ! तू किसी न किसी तरहां आ ही जाती.ना जाने तेरा मुजसे

ये कैसा नाता था?क्यों मेरे पीछे पड गई है तु?

आज मुझे परदेश जाने का मौका मिला है.मै बहोत खुश हुं.

ऎ किरन ! चल अब तो तेरा पीछा छुटेगा !

दो साल बाद वापस लौटने पर…..

जैसे ही मैने अपने घर का दरवाजा खोला !

मेरा घर मेरा नहीं लगा मुझे,

क्या कमी थी मेरे घर मैं?

क्या गायब था मेरे घर से?…..

अरे हां ! याद आया ! वो किरन नज़र नहीं आती !

बहोत ढुंढा ऊसे,पर कहीं नज़र नहीं आई,वो किरन,

खिड़की से सारी चिलमनें हटा दी मैने,फिर भी वो नहीं आई,

क्या रुठ गई है मुझ से?

घर का दरवाज़ा खोलकर देखा तो,

घर की खिड़की के सामने बहोत बडी ईमारत खडी थी.उसी ने किरन को

रोके रखा था.

आज मैं तरसती हुं, ऊस किरन को, जो मेरे घर में आया करती थी.

कभी चुभती थी मेरी आंखों में..मेरे गालों पर…

आज मेरा घर अधूरा है, ऊसके बिना.ऊसके ऊजाले से मेर घर रोशन था.

पर आज ! वो रोशनी कहां? क्यों कि ….!

वो धूप की किरन नहीं..