किनारे छूट जाते है

timeबूरा जब वक़्त आता है, सहारे छूट जाते हैं।
जो हमदम बनते थे हरदम, वो सारे छूट जातेहै।

बड़ा दावा करें हम तैरने का जो समंदर से,
फ़सेँ जब हम भँवर में तो, किनारे छूट जाते है।

जो चंदा को ग्रहण लग जाये, सूरज साथ छोडे तो,
वो ज़गमग आसमाँ के भी सितारे छूट जाते है।

जिन्हें पैदा किया, पाला, बडे ही चाव से हमने।
जवानी की उडानों में, दूलारे छूट जाते है।

जो दिल में दर्द हो ग़र्दीश में जीवन आ गया हो तब,
कभी लगते थे वो सुंदर, नज़ारे छूट जाते है।

जो दौलत हाथ में हो तब, पतंगा बन के वो घूमे,
चली जाये जो दौलत तो वो प्यारे छूट जाते है।

मुसीबत में ही तेरे काम कोइ आये ना ‘रज़िया”
यकीनन दिल से अपने ही हमारे छूट जाते है।

मुस्कुराती गज़ल।

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झुमती गाती और गुनगुनाती गज़ल,गीत कोइ सुहाने सुनाती गज़ल।

ज़िंदगी से हमें है मिलाती गज़ल,

उसके अशआर में एक इनाम है,उसके हर शेर में एक पैगाम है।

सबको हर मोड पे ले के जाती गज़ल।

उसको ख़िलवत मिले या मिले अंजुमन। उसको ख़िरमन मिले या मिले फ़िर चमन,

वो बहारों को फ़िर है ख़िलाती गज़ल।

वो इबारत कभी, वो इशारत कभी। वो शरारत कभी , वो करामत कभी।

हर तरहाँ के समाँ में समाती गज़ल

वो न मोहताज है, वो न मग़रूर है। वो तो हर ग़म-खुशी से ही भरपूर है।

हर मिज़ाजे सुख़न को जगाती गज़ल।

वो महोब्बत के प्यारों की है आरज़ु। प्यार के दो दिवानों की है जुस्तजु।

हो विसाले मोहबबत पिलाती गज़ल।

वो कभी पासबाँ, वो कभी राजदाँ। उसके पहेलु में छाया है सारा जहाँ।

लोरियों में भी आके सुनाती गज़ल।

वो कभी ग़मज़दा वो कभी है ख़फा। वक़्त के मोड पर वो बदलती अदा।

कुछ तरानों से हर ग़म भुलाती गज़ल।

वो तो ख़ुद प्यास है फ़िर भी वो आस है। प्यासी धरती पे मानो वो बरसात है।

अपनी बुंदोँ से शीद्दत बुज़ाती गज़ल।

उसमें आवाज़ है उसमें अंदाज़ है। इसलिये तो दीवानी हुइ राज़ है।

जब वो गाती है तब मुस्कुराती गज़ल।

इरशाद न कर

 

         जो चला वक्त  उसी वक्त को तूँ याद न कर।

बीती पलकों में यूं ही जिन्दगी बरबाद न कर।

 भूल जा भुले हुए रिश्तों को जो छोड़ चले।

उनकी यादों की ज़हन में बडी तादाद न कर।

 ना मिलेगा तुज़े ये बात कहेगा सब को।

अपने दर्दों की परायों से तुं फरियाद न कर।

 जो नहिं उसके ख़ज़ाने में तुज़े क्या देगा?

ना दिलासा ही सही उससे युं इमदाद न कर।

 राज़जब कोई गज़ल छेड दे ज़ख़्मों को तेरे।

तुं उसी शेर के शायर को ही इरशाद न कर।

 

 

 

 

 

 
 

 

 

  

प्रहर

     

 

अंधेरे हैं भागे प्रहर हो चली है।

परिंदों को उसकी ख़बर हो चली है।

 

सुहाना समाँ है हँसी है ये मंज़र।

ये मीठी सुहानी सहर हो चली है।

 

कटी रात के कुछ ख़यालों में अब ये।

जो इठलाती कैसी लहर हो चली है।

 

जो नदिया से मिलने की चाहत है उसकी।

उछलती मचलती नहर हो चली है।

 

सुहानी-सी रंगत को अपनों में बाँधे।

ये तितली जो खोले हुए पर चली है।

 

है क़ुदरत के पहलू में जन्नत की खुशबू।

बिख़र के जगत में असर हो चली है।

 

मेरे बस में हो तो पकडलुं नज़ारे।

चलो राज़ अब तो उमर हो चली है।

रिश्तों का मोल

 

 

 

 क्यों देर हुई साजन तेरे यहाँ आने में?

क्या क्या न सहा हमने अपने को मनानेमें।

तुने तो हमें ज़ालिम क्या से क्या बना डाला?

अब कैसे यकीँ कर लें, हम तेरे बहाने में।

                      उम्मीदों के दीपक को हमने जो जलाया था।

                      तुने ये पहल कर दी, क्यों उसको बुज़ाने में।

                      बाज़ारों में बिकते है, हर मोल नये रिश्ते।

                      कुछ वक्त लगा हमको, ये दिल को बताने में।

                      थोडी सी वफ़ादारी गर हमको जो मिल जाती,

                      क्या कुछ भी नहिं बाक़ी अब तेरे ख़ज़ाने में।

                      अय राज़ उसे छोडो क्यों उसकी फ़िकर इतनी।

                      अब ख़ेर यहीं करलो, तुम उसको भुलाने में।