तिरंगा लहराया है।

 

देख़ो भारतवालो देख़ो, फ़िर आज़ तिरंगा छाया है।

है पर्व देश का आज यहाँ, ये याद दिलाने आया है।

रंग है केसरीया क्रांति का, और सफ़ेद है जो शांति का।

हरियाला रंग है हराभरा, पैग़ाम देशकी उन्नति का।

अशोकचक्र ने भारत को प्रगति करना जो सिखाया है।

देख़ो भारतवालो देख़ो ।

वो वीर सिपाही होते हैं,सरहद पे शहीदी पाते है।

वो भारत के शुरवीर शहीद सम्मान राष्ट्र का पाते है।

वो बडे नसीबोंवाले है, मरने पर जिन्हें उढाया है।

 देख़ो भारतवालो देख़ो।

हम वादा करते है हरदम, सम्मान करेंगे इसका हम।

चाहे जो जान चली जाये, पीछे ना हटेंगे अपने क़दम।

जन-गण-मन गीत सभी ने फ़िर एक ऊंचे सुर में गाया है।

 देख़ो भारतवालो देख़ो।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक, बंगाल से कच्छ की ख़ाडी तक।

उत्तर से दक्षिण, पष्चीम से पूरब की हर हरियाली तक।

हर और तिरंगा छाया है, और भारत में लहराया है।

 देख़ो भारतवालो देख़ो।

 

 
 

 

माँ

 

 

 

 

 

मेरी ख़ामोशीओं की गुंज सदा देती है।

तू सुने या ना सुने तुज़को दुआ देती है।

 मैंने पलकों में छुपा रख्खे थे आँसू अपने।(2)

रोकना चाहा मगर फ़िर भी बहा देती है।

 मैंने पाला था बड़े नाज़-मुहब्बत से तुझे(2)

क्या ख़बर जिंदगी ये उसकी सज़ा देती है।

 तूँ ज़माने की फ़िज़ाओं में कहीं गुम हो चला(2)

तेरे अहसास की खुशबू ये हवा देती है।

 तूँ कहीं भी रहेअय लाल मेरे दूरी पर(2)

दिल की आहट ही मुझे तेरा पता देती है।

 

 

 
 
 
 

 

 

तरसना कैसा?

ज़ाम जब पी ही लिया है तो सँभलना कैसा?

समंदर सामने है फ़िर अपना  तरसना कैसा?

 

 

ख़ुलके जी लेते है वों फ़ुल भी कुछ पल के लिये।

हम भी जी लें ये बहारों में सिमटना कैसा?

 

 

ख़ुदको चट्टान की मजबूती से तोला था कभी !

तो क्यों ये मोम बने तेरा पिघलना कैसा?

 

 

सामने राह खुली है तो चलो मंजिल तक।

कारवाँ बनके बया बाँ में भटकना कैसा?

 

 

न कोइ भूल ना गुनाह हुवा है तुज़से,

देखकर आईना तेरा ये लरजना कैसा?

 

 

दस्तखत कोइ नहिं जिंदगी के पन्नों पर।

राज़ दिल ये तो बता तेरा धड़कना कैसा?

 

माया

 

 

 

     क्यों दौड रहा है किसी परछाइ के पीछे?

आगे तो ज़रा देख वो छाया तो नहीं है?

 

           इतना तो न बन अँध, ओ नादान मुसाफिर !

        क्या है ये हक़िकत या कि माया तो नहि है?

 

             जिसको तु समज़ता है हमेंशा से ही अपना।

     तेरा ही है या और-पराया तो नहिं है?

 

               जुगनु की चमक देख के खिंचता चला है तु,

                ये तुज़को दिखाने को सजाया तो नहिं है?

 

                       सहेरा में कहीं बहता है पानी अरे “रज़िया” !

                   धोख़ा है समज़ ये तो बहाया ही नहिं है?