अंधेरे हैं भागे प्रहर हो चली है। परिंदों को उसकी ख़बर हो चली है। सुहाना समाँ है हँसी है ये मंज़र। ये मीठी सुहानी सहर हो चली है। कटी रात के कुछ ख़यालों में अब ये। जो इठलाती कैसी लहर हो चली है। जो नदिया से मिलने की चाहत है [...]
Archive for the ‘प्रकृति रस’ Category
प्रहर
Posted in प्रकृति रस on सितम्बर 9, 2008 | 3 Comments »
मौसम
Posted in प्रकृति रस on जुलाई 17, 2008 | 4 Comments »
आया मौसम बड़ा ही सुहाना।(2) ले के आया है कोई ख़ज़ाना।…आया मौसम… आसमॉं पे है बदरी जो छाई, जैसे काली-सी चादर बिछाई। डूबा मस्ती में सारा ज़माना।हो…(2) ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम… आज बादल से बरख़ा गीरि है। सुख़ी धरती को ठंडक मिली है। कैसे निकला है धरती [...]
कारवॉ
Posted in प्रकृति रस on जुलाई 4, 2008 | 5 Comments »
कारवॉ मेरे पंख मुज़से न छीनलो, मुझे आसमॉ की तलाश है। मैं हवा हूँ मुझको न बॉधलो , मुझे ये समॉ की तलाश है। मुझे मालोज़र की ज़रुर क्या? मुझे तख़्तो-ताज न चाहिये ! जो जगह पे मुज़को सुक़ुं मिले, मुझे वो जहाँ की तलाश है। मैं तो [...]
