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Archive for the ‘करुण रस’ Category

वजुद

मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे जाने पर। में चुराकर लाई हुं तेरे हा थों के वो रुमाल जिससे तूं अपना चहेरा पोंछा करती थी। मैं चुराकर लाई हुं वो तेरे कपडे जो तुं पहना करती थी। मैं चुराकर लाई हुं पानी का वो प्याला, जो तु [...]

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उज़डा शहर

                                            ये शहर अब वों शहर नहीं,  न जाने किसकी नज़र लगी?(2)        यहॉ झिलमिलाते चिराग थे, यहॉ टिमटिमाते सितारे थे। यहॉ रोज़ दिन में ईद थी, यहॉ रात एक दीवाली थी। अब यहॉ अमास का आसमॉ।…. न जाने किसकी नज़र लगी?(2)   यहॉ ऊंचे मकान थे, कभी इस में भी इन्सान थे। यहॉ [...]

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हमारा घर मेरा घर, हमारा घर, हम सब का घर। बडी, मंझली, छोटी और मुन्ने का घर ।   जहाँ हम पले, जहाँ हमने अपनी पहली सांस ली। जिसमें हमारा वजुद बना। जिस से हमारे ताने-बाने जुडे हुए थे, वो हमारा घर। पर आज….हमारे उसी घर को, घेर रख़ा है दिमक ने। दिमक ने अपना [...]

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अय धूप की किरन! तू हर सुबह मेरे घर की खिड़की पर दस्तक देती थी. छोटी-छोटी किवाडों से मेरे घर में चली आया करती थी. मैं चिलमन लगा देती फिर भी तू चिलमनो से झांक लिया करती. तेरी रोशनी चुभती थी मेरी आंखों में,मेरे गालों पर,मेरी पेशानी पर, मैं तुझे छुपाने कि कोशिश करती थी [...]

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