मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे जाने पर। में चुराकर लाई हुं तेरे हा थों के वो रुमाल जिससे तूं अपना चहेरा पोंछा करती थी। मैं चुराकर लाई हुं वो तेरे कपडे जो तुं पहना करती थी। मैं चुराकर लाई हुं पानी का वो प्याला, जो तु [...]
Archive for the ‘करुण रस’ Category
वजुद
Posted in करुण रस on मई 3, 2009 | 17 Comments »
उज़डा शहर
Posted in करुण रस on जून 14, 2008 | 4 Comments »
ये शहर अब वों शहर नहीं, न जाने किसकी नज़र लगी?(2) यहॉ झिलमिलाते चिराग थे, यहॉ टिमटिमाते सितारे थे। यहॉ रोज़ दिन में ईद थी, यहॉ रात एक दीवाली थी। अब यहॉ अमास का आसमॉ।…. न जाने किसकी नज़र लगी?(2) यहॉ ऊंचे मकान थे, कभी इस में भी इन्सान थे। यहॉ [...]
हमारा घर
Posted in करुण रस on मई 15, 2008 | 6 Comments »
हमारा घर मेरा घर, हमारा घर, हम सब का घर। बडी, मंझली, छोटी और मुन्ने का घर । जहाँ हम पले, जहाँ हमने अपनी पहली सांस ली। जिसमें हमारा वजुद बना। जिस से हमारे ताने-बाने जुडे हुए थे, वो हमारा घर। पर आज….हमारे उसी घर को, घेर रख़ा है दिमक ने। दिमक ने अपना [...]
अय धूप की किरन!
Posted in करुण रस on मई 15, 2008 | 2 Comments »
अय धूप की किरन! तू हर सुबह मेरे घर की खिड़की पर दस्तक देती थी. छोटी-छोटी किवाडों से मेरे घर में चली आया करती थी. मैं चिलमन लगा देती फिर भी तू चिलमनो से झांक लिया करती. तेरी रोशनी चुभती थी मेरी आंखों में,मेरे गालों पर,मेरी पेशानी पर, मैं तुझे छुपाने कि कोशिश करती थी [...]
