कलम
August 2, 2009 by "रज़िया"

है बड़ा उसमें जो दम।
चल पडे उसके कदम।
देखो क्या करती कलम।
कभी होती है नरम।
कभी होती है गरम।
देखो क्या करती कलम।
छोड देती है शरम।
खोल देती है भरम।
देखो क्या करती कलम।
कभी देती है ज़ख़म।
कभी देती है मरहम।
देखो क्या करती कलम।
कभी लाती है वहम।
कभी लाती है रहम।
देखो क्या करती कलम।
कभी बनती है नज़म।
कभी बनती है कसम।
देखो क्या करती कलम।
लिख्नना है उसका धरम।
चलना है उसका करम।
देखो क्या करती कलम।
Posted in समाज रस | 10 Comments
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कलम को लेकर बहुत खूबसूरत नज्म लिखी है आपने।
आपसे एक रिक्वेस्ट है कि इस ब्लॉग को भी अपडेट करती रहें।
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और अब दो स्क्रीन वाले लैपटॉप।
एक आसान सी पहेली-बूझ सकें तो बूझें।
कलम का सुंदर वर्णन।
कलम का सुंदर वर्णन।बहुत सुन्दर रचना है…………
Kalam ka sateek chitran.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
कलम का सुंदर वर्णन।
{ Treasurer-S, T }
छोड देती है शरम।
खोल देती है भरम।
देखो क्या करती कलम।
लिख्नना है उसका धरम।
चलना है उसका करम।
देखो क्या करती कलम।
बहुत सुन्दर रचना है.
छोड देती है शरम।
खोल देती है भरम।
देखो क्या करती कलम।
लिख्नना है उसका धरम।
चलना है उसका करम।
देखो क्या करती कलम।
बहुत सुन्दर रचना है.
महावीर
मंथन
कलम की महिमा अनंत है.
{ Treasurer-T & S }
कभी बनती है नज़म।
कभी बनती है कसम।
वाकई कलम मे बहुत ताकत है
बहुत सुन्दर रचना
Raziaji, very nice poem on pen and power.