अंधेरे हैं भागे प्रहर हो चली है।
परिंदों को उसकी ख़बर हो चली है।
सुहाना समाँ है हँसी है ये मंज़र।
ये मीठी सुहानी सहर हो चली है।
कटी रात के कुछ ख़यालों में अब ये।
जो इठलाती कैसी लहर हो चली है।
जो नदिया से मिलने की चाहत है उसकी।
उछलती मचलती नहर हो चली है।
सुहानी-सी रंगत को अपनों में [...]
Archive for September 9th, 2008
प्रहर
Posted in प्रकृति रस on September 9, 2008 | 3 Comments »
