Posted in समाज रस on August 7, 2008 | 7 Comments »
मेरी ख़ामोशीओं की गुंज सदा देती है।
तू सुने या ना सुने तुज़को दुआ देती है।
मैंने पलकों में छुपा रख्खे थे आँसू अपने।(2)
रोकना चाहा मगर फ़िर भी बहा देती है।
मैंने पाला था बड़े नाज़-मुहब्बत से तुझे(2)
क्या ख़बर जिंदगी ये उसकी सज़ा देती है।
तूँ ज़माने की फ़िज़ाओं में कहीं गुम हो चला(2)
तेरे अहसास की खुशबू ये हवा [...]
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Posted in समाज रस on August 7, 2008 | 2 Comments »
ज़ाम जब पी ही लिया है तो सँभलना कैसा?
समंदर सामने है फ़िर अपना तरसना कैसा?
ख़ुलके जी लेते है वों फ़ुल भी कुछ पल के लिये।
हम भी जी लें ये बहारों में सिमटना कैसा?
ख़ुदको चट्टान की मजबूती से तोला था कभी !
तो क्यों ये मोम बने तेरा पिघलना कैसा?
सामने राह खुली है तो चलो मंजिल तक।
कारवाँ [...]
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