कानों में गुनगुनातीं हैं वो माँ की लोरियाँ।
बचपन में ले के जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
लग जाये जो कभी किसी अनजान सी नज़र,
नजरें उतार जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
भटकें जो राह हमारा कभी अपनों के साथ से,
आके हमें मिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
हो ग़मज़दा जो दिल कभी करता है याद जब,
हमको बड़ा हँसाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
अफ़्सुर्दगी कभी हो या तनहाई हो कभी,
अहसास कुछ दिलाती है वो माँ की लोरियाँ।
पलकों पे हाथ फ़ेरके ख़्वाबों में ले गइ,
मीठा-मधुर गाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
दुनिया के ग़म को पी के जो हम आज थक गये,
अमृत हमें पिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
माँ ही हमारी राहगीर ज़िंदगी की है,
जीना वही सिखाती है वो माँ की लोरियाँ।
अय “राज़” माँ ही एक है दुनिया में ऐसा नाम,
धड़कन में जो समाती हैं वो माँ की लोरियाँ।


मा की लोरिया — सदा सर्वदा प्रासंगिक है.
बहुत सुन्दर लिखा है.
बहोत ही अच्छी कविता रज़ियाजी … हर बार की तरह …
मेरे खयाल से “मां” एक ऐसा पहलु है ईन्सानी ज़िंदगीका जिसके कई रंग है .. और हर रंग एक अलग जज़्बा है अपने आप में … हम चाहे जितना सोचें-समजें-लिखें-पढें … पर मां के बारेमें कभी भी तमामतर बातें कहे पाना नामुमकीन है !!
मेरी एक गुजराती कविताकी एक पंक्ति कुछ ईस तरह है ..
સુખોથી પર એવા સુખની વાત,
માંના ખોળામાં નીદરની વાત … !!!
माँ ही हमारी राहगीर ज़िंदगी की है,
जीना वही सिखाती है वो माँ की लोरियाँ।
बहुत सही बात!
रजिया जी बहुत ही सुन्दर कविता हे मां पर
दुनिया के ग़म को पी के जो हम आज थक गये,
अमृत हमें पिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
धन्यवाद
બહુ બહુ બહુજ લાગણીસભર