आदमी है, आदमी से मिल मिलाता तू चलाजा।
गीत कोइ प्यार के बस गुनगुनाता तू चलाजा।
गर तुझे अँधियारा राहों में मिले तो याद रख़,
हर जगह दीपक उजाले के जलाता तू चलाजा।
जो तुझे चूभ जायें काँटे, राह में हो बेखबर,
अपने हाथों से हटा कर, गुल बिछाता तू चलाजा।
सामने तेरे ख़डी है जिंदगानी देख ले,
बीती यादों को सदा [...]
Archive for July, 2008
मुस्कुराता तू चलाजा
Posted in समाज रस on July 31, 2008 | 4 Comments »
माँ की लोरियाँ
Posted in समाज रस on July 28, 2008 | 5 Comments »
कानों में गुनगुनातीं हैं वो माँ की लोरियाँ।
बचपन में ले के जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
लग जाये जो कभी किसी अनजान सी नज़र,
नजरें उतार जाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
भटकें जो राह हमारा कभी अपनों के साथ से,
आके हमें मिलाती हैं वो माँ की लोरियाँ।
हो ग़मज़दा जो दिल कभी करता है याद जब,
हमको बड़ा [...]
मौसम
Posted in प्रकृति रस on July 17, 2008 | 4 Comments »
आया मौसम बड़ा ही सुहाना।(2)
ले के आया है कोई ख़ज़ाना।…आया मौसम…
आसमॉं पे है बदरी जो छाई,
जैसे काली-सी चादर बिछाई।
डूबा मस्ती में सारा ज़माना।हो…(2)
ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…
आज बादल से बरख़ा गीरि है।
सुख़ी धरती को ठंडक मिली है।
कैसे निकला है धरती से दाना हो..(2)
ले के आया है कोई ख़जाना।…आया मौसम…
आज बरख़ा ने सब को [...]
हज़ारों नाम वाले
Posted in भक्ति रस on July 15, 2008 | 4 Comments »
दाता तेरे हज़ारों है नाम…(2)
कोइ पुकारे तुज़े कहेकर रहिम,
और कोइ कहे तुज़े राम।…दाता(2)
क़ुदरत पर है तेरा बसेरा,
सारे जग पर तेरा पहेरा,
तेरा ‘राज़’बड़ा ही गहेरा,
तेरे ईशारे होता सवेरा,
तेरे ईशारे हिती शाम।…दाता(2)
ऑंधी में तुं दीप जलाये,
पथ्थर से पानी तुं बहाये,
बिन देखे को राह दिख़ाये,
विष को भी अमृत तु बनाये,
तेरी कृपा हो घनश्याम।…दाता(2)
क़ुदरत के हर-सु में बसा [...]
ज़िंदगी
Posted in पधभाव तरंग on July 7, 2008 | 5 Comments »
ज़िंदगी
ज़िंदगी तूने बसाया अपनी ये आग़ोश में।
ज़िंदगी तूने समाया अपनी ये आग़ोश में।
मरसिये ग़म के कभी तो खुशीयों के गाने यहां।
”वाह” क्या क्या है सूनाया, अपनी ये आग़ोश में।
तूने जो चाहा, सराहा, अपनी मरज़ी से यहां।
झांसा देकर यूँ हंसाया अपनी ये आग़ोश में।
फ़ल्क़ पर ले जा बिठाया, या गिराया रेत पर।
तूने जी चाहा उठाया, अपनी [...]
कारवॉ
Posted in प्रकृति रस on July 4, 2008 | 4 Comments »
कारवॉ
मेरे पंख मुज़से न छीनलो,
मुझे आसमॉ की तलाश है।
मैं हवा हूँ मुझको न बॉधलो ,
मुझे ये समॉ की तलाश है।
मुझे मालोज़र की ज़रुर क्या?
मुझे तख़्तो-ताज न चाहिये !
जो जगह पे मुज़को सुक़ुं मिले,
मुझे वो जहाँ की तलाश है।
मैं तो फ़ुल हूं एक बाग़ का।
मुझे शाख़ पे बस छोड दो।
में खिला अभी-अभी तो हूं।
मुझे [...]
याद है
Posted in पधभाव तरंग on July 4, 2008 | 1 Comment »
वक़्त ने साथ छोड़ा हमारा जो था,
हाय तेरा, तड़पना मुझे याद है।
मुंह छिपाकर तेरा मेरी आगोश में,
हाय कैसा बिलख़ना मुझे याद है।…हॉ मुझे याद है।
प्यार की वादीओ में गुज़ारे जो पल,
कैसे दिल से ओ साथी भूला पायेंगे?
जिन लकीरों पे कस्मे जो खाइ थीं कल,
आज हम वो लकीरें मिटा पायेंगे?
उन रक़ीबों के ज़ुल्मों को मेरे सनम,
हाय [...]
मक़डी का जाल
Posted in पधभाव तरंग on July 1, 2008 | 4 Comments »
हिंमत हारा बैठा था में,
पीठ फिराये भविष्य से।
हार चुका था अपनी शक्ति,
अपनी ही कमजोरी से ।
देखा मैंने एक मकड़ी को,
बार बार यूँ गिरते हुए।
अपने बुने हुए जाल पे फिर भी,
कंई बार जो सँभलते हुए।
गिरती रही, सँभलती रही पर..
बुनती रही वो अपना जाल।
पुरा बन चुकने पर मकडी,
जैसे हो गइ हो निहाल।
एक छोटी मक़्डी ने मुझ [...]
