पीठ फिराये भविष्य से।
हार चुका था अपनी शक्ति,
अपनी ही कमजोरी से ।
देखा मैंने एक मकड़ी को,
बार बार यूँ गिरते हुए।
अपने बुने हुए जाल पे फिर भी,
कंई बार जो सँभलते हुए।
गिरती रही, सँभलती रही पर..
बुनती रही वो अपना जाल।
पुरा बन चुकने पर मकडी,
जैसे हो गइ हो निहाल।
एक छोटी मक़्डी ने मुझ में,
भर दी हिंमत कंई अपार।
कुछ करने की ठान ली मैंने,
अब ना रहा मैं यूँ लाचार।
मक़डी ने सिखलाया मुज़को,
हरदम कोशिश करते रहना।
”राज़” कितनी बाधाएं आयें,
हरदम कदम बढाये रहना।
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