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                                   हिंमत हारा बैठा था में,

पीठ फिराये भविष्य से।

 

हार चुका था अपनी शक्ति,

अपनी ही कमजोरी से ।

 

 

देखा मैंने एक मकड़ी को,

बार बार  यूँ गिरते हुए।

 

अपने बुने हुए जाल पे फिर भी,

कंई बार जो सँभलते हुए।

 

 

गिरती रही, सँभलती रही पर..

बुनती रही वो अपना जाल।

 

पुरा बन चुकने पर मकडी,

जैसे हो गइ हो निहाल।

 

 

एक छोटी मक़्डी ने मुझ में,

भर दी हिंमत कंई अपार।

 

कुछ करने की ठान ली मैंने,

अब ना रहा मैं यूँ लाचार।

 

 

मक़डी ने सिखलाया मुज़को,

हरदम कोशिश करते रहना।

 

राज़ कितनी बाधाएं आयें,

हरदम कदम बढाये रहना।

बचपन


बचपन हॉ हॉ ये बचपन।
नादान भोला ये बचपन।
कहीं ऑसु से भीगा ये बचपन।
कहीं पैसों में भीगा ये बचपन।
धूल-मिट्टी में खोया ये बचपन।
फ़ुटपाथसडक पर संजोया ये बचपन।
रेंकडी पर जुतों की पोलिश पर चमकता ये बचपन।
कहीं कुडेदान में खेलता ये बचपन।
कहीं गरम सुट में घुमता ये बचपन।
कहीं फ़टे कपडों में नंगा घुमता ये बचपन।
 कहीं मर्सीडीज़ कारों में घुमता ये बचपन।
कहीं कारो  केशीशे पोंछता  ये बचपन।
कहीं मेगेज़ीन बेचता ये बचपन।
कही  महेलों में   ज़ुलता ये बचपन।
कहीं फ़टी साडी में ज़ुलता ये बचपन।
कहीं केडबरीज़ के  रेपर में खोया ये बचपन।
कहीं सुख़ी रोटी की पोलीथीन में खोया ये बचपन।
कहीं एरोड्राम पर टहलता ये बचपन।
कहीं नट बनकर दोरी पर चलता ये बचपन।
पर……
कहीं बाई के हाथों में पलता ये बचपन।
तो कहीं ममता की छाया में संभलता ये बचपन।
बचपन हॉ हॉ ये बचपन।

पैग़ाम

 

                              

 

 

देख़ो लोगों मेरे जाने का है पैग़ाम आया..(2)

ख़ुदा के घर से है ये  ख़त, मेरे नाम आया….देख़ो लोगो…

 

जिसकी ख़वाहिश में ता-जिन्दगी तरसते रहे।

वो तो ना आये मगर मौत का ये जाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

ज़िंदगी में हम चमकते रहे तारॉ की तरहॉ ।

रात जब ढल गइ, छुपने का ये मक़ाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

राह तकते रहे-ता जिन्दगी दिदार में हम |

ना ख़बर आइ ना उनका कोइ सलाम आया । ख़ुदा के घर…..

 

चल चुके दूर तलक मंज़िलॉ की खोज में हम।

अब बहोत थक गये रुकने का ये मक़ाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

हम मुहब्बत् में ज़माने को कुछ युं भूल गये ।

हम है दिवाने, ज़माने का ये इल्ज़ाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

जिसने छोडा था ज़माने में युं तन्हा रज़िया

क़ब्र तक छोड़ने वो क़ाफ़िला तमाम आया। ख़ुदा के घर…..

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

यादें

                                       

                                                 

                                                  यादें

 

पीछे मुड के हमने जब देख़ा ,गुज़रा वो ज़माना याद आया।

बीती एक कहानी याद आइ, बीता एक फ़साना याद आया।…..पीछे.

 

सितारों को छूने की चाहत में, हम शम्मे मुहब्बत भूल गये।(2)

जब शम्मा जली एक कोने में, हम को परवाना याद आया।…..पीछे.

 

शीशे के महल में रहकर हम, तो हँसना-हँसाना भूल गये।(2)

पीपल की ठंडी छाँव तले वो हॅसना-हॅसाना याद आया।…..पीछे.

 

दौलत ही नहीं ज़ीने के लिये, रिश्ते भी ज़रूरी होते है।(2)

दौलत ना रही जब हाथों में, रिश्तों का खज़ाना याद आया।…..पीछे.

 

शहरॉ की ज़गमग-ज़गमग में, हम गीत वफ़ा के भूल गये।(2)

सागर की लहरॉ पे हमने, गाया था तराना याद आया।…..पीछे.

 

चलते ही रहे चलते ही रहे, मंजिल का पता मालूम न था।(2)

वतन की वो भीगी मिट्टी का अपना वो ठिकाना याद आया।…..पीछे.

 

अपनॉ ने हमें कमज़ोर किया, बाबुल वो हमारे याद आये।(2)

कमज़ोर वो ऑखॉ से उन को वो अपना रुलाना याद आया।…..पीछे.

 

अय “राज़” कलम तुं रोक यहीं, वरना हम भी रो देंगे।(2)

तेरी ये गज़ल में हमको भी कोइ वक़्त पुराना याद आया।…..पीछे.

 

तलाश

 

 

 

 

 

 

 

  तलाश

सफर में ख़ो गई मंज़िल,उसे तलाश करो।.

 किनारे छूटा है साहिल, उसे तलाश करो।.

 

था अपना साया भी इस वक़्त साथ छोड़ गया।.

कहॉ वो हो गया ओझल उसे तलाश करो।

 

ना ही ज़ख़म,ना तो है खून फिर भी मार गया।

कहॉ छुपा है वो कातिल, उसे तलाश करो।

 

भूला चला है वक़्त जिन्दगी के लम्हों को।

मगर धड़कता है क्यों दिल? उसे तलाश करो।

 

ये कारवॉ है तलाशी का, लो तलाश करें।

हो जायॆं हम भी तो शामिल, उसे तलाश करो।

 

वो बोले हम है गुनाहगार उनके साये के।

कहां पे रह गये ग़ाफिल उसे तलाश करो।

 

लुटा दिया था हरेक वक़्त उनके साये में।

मगर नहिं है क्यों क़ाबिल, उसे तलाश करो।

 

समझ रहे थे ज़माने में हम भी कामिल हैं।

हमारा खयाल था बातिल उसे तलाश करो।

 

अय राज खूब तलाशी में जुट गये तुम भी।

बताओ क्या हुआ हॉसिल? ,उसे तलाश करो।

 

                                         

 

ये शहर अब वों शहर नहीं,

 न जाने किसकी नज़र लगी?(2)

      

यहॉ झिलमिलाते चिराग थे,

यहॉ टिमटिमाते सितारे थे।

यहॉ रोज़ दिन में ईद थी,

यहॉ रात एक दीवाली थी।

अब यहॉ अमास का आसमॉ।…. न जाने किसकी नज़र लगी?(2)

 

यहॉ ऊंचे मकान थे,

कभी इस में भी इन्सान थे।

यहॉ महेफिलॉ में थी रोशनी,

यहॉ बज़ती थी हर रागिनी।

अब यहॉ है खंडहर के नशॉ।…. न जाने किसकी नज़र लगी?(2)

 

यहॉ बागों में तो बहार थी।

यहॉ तितलीयॉ भी हज़ार थी।

ये सँवरता था दुल्हन तरहॉ,

ये महकता था गुलशन तरहॉ।

अब यहॉ लगा उज़डा समॉ।…. न ज़ाने किसकी नज़र लगी?(2)

 

बरख़ा

                  

 

देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

आसमान से बरसा पानी.. देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

पत्ते पेड़ हुए हरियाले।

पानी-पानी नदियां नाले।

धरती देख़ो हो गई धानी। देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

मेंढक ने जब शोर मचाया।

मुन्ना बाहर दौड़ के आया।

हंसके बोली ग़ुडीया रानी। देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

बिज़ली चमकी बादल गरज़े।

रिमझिम रिमझिम बरख़ा बरसे।

आंधी आई एक तुफ़ानी। देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

कोयल की कुउ,कुउ,कुउ सुनकर।

पपीहे की थर,थर,थर भरकर।

राज़हो गई है दीवानी। देख़ो आई रुत मस्तानी..(2)

 

 

                         

                                                                         मेरा वतन याद आया।

 

 

मेरे ख्वाब में आके किसने जगाया।

मुझे आज मेरा वतन याद आया।

जो भुले थे वो आज फिर याद आया।

   मुझे आज म्रेरा वतन याद आया।

वो गांवों के खेतों के पीपल के नीचे।

वो नदीया किनारे के मंदिर के पीछे।

वो खोया हुआ अपनापन याद आया।

   मुझे आज मेरा वतन याद आया।

वो सखियों सहेली कि बातें थीं न्यारी।

वो बहना की छोटी-सी गुडिया जो प्यारी।

वो बचपन की यादों ने फिर से सताया।

   मुझे आज मेरा वतन याद आया।

वो भेडों की,ऊंटों की लंबी कतारें।

वो चरवाहों की पीछे आती पुकारें।

कोई बंसरी की जो धून छेड आया।

   मुझे आज मेरा वतन याद आया।

वो बाबुल का दहेलीज पे आके रूकना।

वो खिड़की के पीछे से भैया का तकना।

जुदाई की घडीयों ने फिर से रुलाया।

   मुझे आज मेरा वतन याद आया।

मेरे देश से आती ठंडी हवाओ,

मुझे राग ऐसा तो कोई सुनाओ।

जो बचपन में था अपनी मां ने सुनाया।

   मुझे आज मेरा वतन याद आया।

    

सवाल

                                        सवाल

मन में उठ्ठा एक सवाल,

आसमॉ गर होता लाल।

मछलियॉ आकाश में उड़ती !

पंछी सब धरती पर चलते !

ईंन्सानों के पंख जो होते !

प्राणी गाते सूर और ताल ।…मन में….

मुकुट  होता फकीर के सर पे !

और राजा के भिक्षा पात्र !

फ़कीर-साईं होते महाराजा !

महाराजा होते कंगाल !…मन में

सोने की जो खेती होती !

अमृत की जो बारिश होती !

सूरज में जो ठंडक होती !

चंदा बरसाता अगनज्वाल !…मन में !

खून अगर होता बेरंगी !

पानी होता रंगबेरंगी !

महीने कईं हफ़्ते बन जाते !

घंटे बन जाते कईं साल !… मन में !

 

 

बंधन

 

 

बंधन

 

ये बंधन टूटेना ।(2)

चाहे कोई बाधा आये, चाहे आये तूफ़ॉ ।

ये बंधन टूटेना ।(2)

साथ कभी छूटेना…ये बंधन टूटेना ।

ये बंधन टूटेना ।(2)

 

 

मेरी चाहत इतनी ग़हरी, जीतना सागर ग़हेरा।

मेरी चाहत इतनी ऊंची, जितना नभ ये ऊँचा।

हाथ कभी छूटेना…ये बंधन टूटेना ।

 

 तूँ मेरी साँसों में समाया, तू मेरी आहों में।

दिल की धड़कन नाम पुकारें, तेरा दिन-रातों में।

सांस मेरी छूटेना…ये बंधन टूटेना ।

 

तुजको चाहा, तुजको पूजा बनके मीरां मैने।

ढूंढा तूजको हर एक मोड पे बनके राधा मैने।

प्यार मेरा छूटेना… ये बंधन टूटेना ।

 

 

 

 

 

 

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