क्यों कैसी रही? आज?
बड़ा ग़ुरूर था अपने आप पर!!
आज नर्म हो गये ना?
वक़्त कब और कैसे अपना रुख़ बदलेगा किसी को पता नहिं है।
और फ़िर अहंकार तो सबसे बूरी बात है।
सब कोइ कहता था कि आप से ही मैं हुं।
आप के बिना मेरा कोइ वज़ुद नहिं।
मैं हमेशाँ ख़ामोश रहा।
या कहो कि मेने भी स्वीकार कर लिया था कि आप के आगे मैं कुछ भी नहिं।
लोग कहते थे कि मेरा मिज़ाज ठंडा है और आप का गर्म।
ख़ेर मैं चुपचाप सुन लिया करता था क्योंकि आप की गर्मी से मैं भी तो डरता था।
भाइ में छोटा हुं ना!
पर आज मैं तुम पर हावी हो गया सिर्फ दो घंटों के लिये ही सही।
सारी दुनिया ने देख़ा कि आज तुम नर्म थे छुप गये थे एक गुनाहगार कि तरहाँ।
थोडी देर के लिये तो मुज़े बड़ा होने दो भैया!
पर एक बात कहुं मुज़े आप पर तरस आ रहा था जब लोग तमाशा देख रहे थे तब!
मैं आप पर हावी होना नहिं चाहता था।
पर मैं क्या करता क़ुदरत के आगे किसी का ना चला है ना चलेगा।
बूरा मत लगाना।
देख़ो आज आप पर आइ इस आपत्ति के लिये सभी दुआ प्रार्थना करते है।
लो मैने अपनी परछाई को आप पर से हटा लिया।
आपको छोटा दिखाना मुज़े अच्छा नहिं लगा।
क्योंकि मैं “चंदा” हुं और तुम “सुरज”।
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तुम जा रही हो, अपने केरियर को एक नया रंग देने के लिये। तुम्हारी प्रगति से सब खुश हो रहे हैं। अभी एक साल पहले ही तो तुम ने एक कॉलेज में अपनी सर्विस शुरु की थी। अच्छी तन्ख्वाह भी मिल रही थी।यहाँ तक की मम्मी-पापा और भैया के साथ रहने को मिल रहा था। पिछले पाँच साल से तुम अपनी पढाइ के लिये अपने परिवार से एक हज़ार किमी. की दूरी पर दिल्ही में पढ रही थी।
पढाइ पूरी होते ही तुम्हें एक अच्छी कॉलेज में सर्विस का ओर्डेर भी मिल जाने से सारा परिवार ख़ुश हो गया। एक ख़ानदानी परिवार के लडके से तुम्हारी राय लेकर मम्मी-पापा ने रिश्ता भी तय कर रख़ा है।
ससुरालवाले भी तुम्हारी पढाइ से काफ़ी खुश हैं। तुम्हारी कुछ ही महिनों में शादी तय हुइ और बस ये आगे पढाइ के लिये जाना पड रहा है।
तुम असंमजस में हो। एक तरफ़ अपना परिवार छोडकर जा रही हो। एक तरफ़ तुम्हारी अपनी केरियर भी है। तुम्हें पता है कि अब जब तुम लौटकर आओगी तुम्हारा ब्याह हो जायेगा।
तुम कल रात छूप-छूपकर रो रही थी वो ताक़ि तुम्हारे मम्मी-पापा कि कहीं नज़र न पड जाये। पर तुम्हारी आँख़ें साफ बता रही थी कि तुम कल रात बहोत रोई हो।
अरे “बेटी” क्या मां-बाप अपनी बेटी का दर्द नहिं समज़ते ?तुम्हें क्या पता इधर तुम्हारी मम्मी-पापा और भैया भी बेचेन हैं अपनी लाडली को दूर भेजने से, पर क्या करें…? अपनी प्यारी बेटी की ज़िन्दगी सँवर जाए इसी में तो ख़ुशी है। उनकी दुआ तो अपनी लाडली के साथ हँमेशां रहेगी ही।
घर के पास लगे पेड़ पर “बुलबुल” के जोडे ने अपने घरोंदे से बच्चे को धक्का दे दिया मानों कह रहे थे ‘अब अपनें पँख पर ऊडने लगो’ पर बच्चा मानता ही नहिं बारबार लौटकर उसी पेड़ की टहनी पर तो कभी घर की ख़िडकी के ईर्द-गिर्द मंडराया करता है।
उधर ईलेक्ट्रिक ख़ंभे पे बैठा ‘बुलबुल’ का जोडा देख रहा है अपने बच्चे को। ईधर घर की दहेलिज़ पर ख़डी “मम्मी” गहरे ख़यालों में ख़ोई हुइ है।
कल दोपहर बारह बजे तुम्हारी फ़्लाइट है। तुम भी उड जाओगी ऊंची उडानें भरने के लिये।
जाओ “बेटी” माँ-बाप की दुआएँ तुम्हारे साथ हैं।
ये कहानी नहिं वास्तविकता है।
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मैं चुराकर लाई हुं तेरी वो तस्वीर जो हमारे साथ तूने खींचवाई थी मेरे जाने पर।
में चुराकर लाई हुं तेरे हा थों के वो रुमाल जिससे तूं अपना चहेरा पोंछा करती थी।
मैं चुराकर लाई हुं वो तेरे कपडे जो तुं पहना करती थी।
मैं चुराकर लाई हुं पानी का वो प्याला, जो तु हम सब से अलग छूपाए रख़ती थी।
मैं चुराकर लाई हुं वो बिस्तर, जिस पर तूं सोया करती थी।
मैं चुराकर लाई हुं कुछ रुपये जिस पर तेरे पान ख़ाई उँगलीयों के नशाँ हैं।
मैं चुराकर लाई हुं तेरे सुफ़ेद बाल, जिससे मैं तेरी चोटी बनाया करती थी।
जी चाहता है उन सब चीज़ों को चुरा लाउं जिस जिस को तेरी उँगलीयों ने छुआ है।
हर दिवार, तेरे बोये हुए पौधे,तेरीतसबीह , तेरे सज़दे,तेरे ख़्वाब,तेरी दवाई, तेरी रज़ाई।
यहां तक की तेरी कलाई से उतारी गई वो, सुहागन चुडीयाँ, चुरा लाई हुं “माँ”।
घर आकर आईने के सामने अपने को तेरे कपडों में देख़ा तो,
मानों आईने के उस पार से तूं बोली, “बेटी कितनी यादोँ को समेटती रहोगी?
मैं तुझ में तो समाई हुई हुं।
“तुं ही तो मेरा वजुद है बेटी”
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बूरा जब वक़्त आता है, सहारे छूट जाते हैं।
जो हमदम बनते थे हरदम, वो सारे छूट जातेहै।
बड़ा दावा करें हम तैरने का जो समंदर से,
फ़सेँ जब हम भँवर में तो, किनारे छूट जाते है।
जो चंदा को ग्रहण लग जाये, सूरज साथ छोडे तो,
वो ज़गमग आसमाँ के भी सितारे छूट जाते है।
जिन्हें पैदा किया, पाला, बडे ही चाव से हमने।
जवानी की उडानों में, दूलारे छूट जाते है।
जो दिल में दर्द हो ग़र्दीश में जीवन आ गया हो तब,
कभी लगते थे वो सुंदर, नज़ारे छूट जाते है।
जो दौलत हाथ में हो तब, पतंगा बन के वो घूमे,
चली जाये जो दौलत तो वो प्यारे छूट जाते है।
मुसीबत में ही तेरे काम कोइ आये ना ‘रज़िया”
यकीनन दिल से अपने ही हमारे छूट जाते है।
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झुमती गाती और गुनगुनाती गज़ल,गीत कोइ सुहाने सुनाती गज़ल।
ज़िंदगी से हमें है मिलाती गज़ल,
उसके अशआर में एक इनाम है,उसके हर शेर में एक पैगाम है।
सबको हर मोड पे ले के जाती गज़ल।
उसको ख़िलवत मिले या मिले अंजुमन। उसको ख़िरमन मिले या मिले फ़िर चमन,
वो बहारों को फ़िर है ख़िलाती गज़ल।
वो इबारत कभी, वो इशारत कभी। वो शरारत कभी , वो करामत कभी।
हर तरहाँ के समाँ में समाती गज़ल
वो न मोहताज है, वो न मग़रूर है। वो तो हर ग़म-खुशी से ही भरपूर है।
हर मिज़ाजे सुख़न को जगाती गज़ल।
वो महोब्बत के प्यारों की है आरज़ु। प्यार के दो दिवानों की है जुस्तजु।
हो विसाले मोहबबत पिलाती गज़ल।
वो कभी पासबाँ, वो कभी राजदाँ। उसके पहेलु में छाया है सारा जहाँ।
लोरियों में भी आके सुनाती गज़ल।
वो कभी ग़मज़दा वो कभी है ख़फा। वक़्त के मोड पर वो बदलती अदा।
कुछ तरानों से हर ग़म भुलाती गज़ल।
वो तो ख़ुद प्यास है फ़िर भी वो आस है। प्यासी धरती पे मानो वो बरसात है।
अपनी बुंदोँ से शीद्दत बुज़ाती गज़ल।
उसमें आवाज़ है उसमें अंदाज़ है। इसलिये तो दीवानी हुइ “राज़” है।
जब वो गाती है तब मुस्कुराती गज़ल।
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जो चला वक्त उसी वक्त को तूँ याद न कर।
बीती पलकों में यूं ही जिन्दगी बरबाद न कर।
भूल जा भुले हुए रिश्तों को जो छोड़ चले।
उनकी यादों की ज़हन में बडी तादाद न कर।
ना मिलेगा तुज़े ये बात कहेगा सब को।
अपने दर्दों की परायों से तुं फरियाद न कर।
जो नहिं उसके ख़ज़ाने में तुज़े क्या देगा?
ना दिलासा ही सही उससे युं इमदाद न कर।
”राज़”जब कोई गज़ल छेड दे ज़ख़्मों को तेरे।
तुं उसी शेर के शायर को ही इरशाद न कर।
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अंधेरे हैं भागे प्रहर हो चली है।
परिंदों को उसकी ख़बर हो चली है।
सुहाना समाँ है हँसी है ये मंज़र।
ये मीठी सुहानी सहर हो चली है।
कटी रात के कुछ ख़यालों में अब ये।
जो इठलाती कैसी लहर हो चली है।
जो नदिया से मिलने की चाहत है उसकी।
उछलती मचलती नहर हो चली है।
सुहानी-सी रंगत को अपनों में बाँधे।
ये तितली जो खोले हुए पर चली है।
है क़ुदरत के पहलू में जन्नत की खुशबू।
बिख़र के जगत में असर हो चली है।
मेरे बस में हो तो पकडलुं नज़ारे।
चलो ”राज़” अब तो उमर हो चली है।
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क्यों देर हुई साजन तेरे यहाँ आने में?
क्या क्या न सहा हमने अपने को मनानेमें।
तुने तो हमें ज़ालिम क्या से क्या बना डाला?
अब कैसे यकीँ कर लें, हम तेरे बहाने में।
उम्मीदों के दीपक को हमने जो जलाया था।
तुने ये पहल कर दी, क्यों उसको बुज़ाने में।
बाज़ारों में बिकते है, हर मोल नये रिश्ते।
कुछ वक्त लगा हमको, ये दिल को बताने में।
थोडी सी वफ़ादारी गर हमको जो मिल जाती,
क्या कुछ भी नहिं बाक़ी अब तेरे ख़ज़ाने में।
अय ‘राज़’ उसे छोडो क्यों उसकी फ़िकर इतनी।
अब ख़ेर यहीं करलो, तुम उसको भुलाने में।
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देख़ो भारतवालो देख़ो, फ़िर आज़ तिरंगा छाया है।
है पर्व देश का आज यहाँ, ये याद दिलाने आया है।
रंग है केसरीया क्रांति का, और सफ़ेद है जो शांति का।
हरियाला रंग है हराभरा, पैग़ाम देशकी उन्नति का।
अशोकचक्र ने भारत को प्रगति करना जो सिखाया है।
देख़ो भारतवालो देख़ो ।
वो वीर सिपाही होते हैं,सरहद पे शहीदी पाते है।
वो भारत के शुरवीर शहीद सम्मान राष्ट्र का पाते है।
वो बडे नसीबोंवाले है, मरने पर जिन्हें उढाया है।
देख़ो भारतवालो देख़ो।
हम वादा करते है हरदम, सम्मान करेंगे इसका हम।
चाहे जो जान चली जाये, पीछे ना हटेंगे अपने क़दम।
जन-गण-मन गीत सभी ने फ़िर एक ऊंचे सुर में गाया है।
देख़ो भारतवालो देख़ो।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, बंगाल से कच्छ की ख़ाडी तक।
उत्तर से दक्षिण, पष्चीम से पूरब की हर हरियाली तक।
हर और तिरंगा छाया है, और भारत में लहराया है।
देख़ो भारतवालो देख़ो।
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मेरी ख़ामोशीओं की गुंज सदा देती है।
तू सुने या ना सुने तुज़को दुआ देती है।
मैंने पलकों में छुपा रख्खे थे आँसू अपने।(2)
रोकना चाहा मगर फ़िर भी बहा देती है।
मैंने पाला था बड़े नाज़-मुहब्बत से तुझे(2)
क्या ख़बर जिंदगी ये उसकी सज़ा देती है।
तूँ ज़माने की फ़िज़ाओं में कहीं गुम हो चला(2)
तेरे अहसास की खुशबू ये हवा देती है।
तूँ कहीं भी रहे”अय लाल मेरे” दूरी पर(2)
दिल की आहट ही मुझे तेरा पता देती है।
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ज़ाम जब पी ही लिया है तो सँभलना कैसा?
समंदर सामने है फ़िर अपना तरसना कैसा?
ख़ुलके जी लेते है वों फ़ुल भी कुछ पल के लिये।
हम भी जी लें ये बहारों में सिमटना कैसा?
ख़ुदको चट्टान की मजबूती से तोला था कभी !
तो क्यों ये मोम बने तेरा पिघलना कैसा?
सामने राह खुली है तो चलो मंजिल तक।
कारवाँ बनके बया बाँ में भटकना कैसा?
न कोइ भूल ना गुनाह हुवा है तुज़से,
देखकर आईना तेरा ये लरजना कैसा?
दस्तखत कोइ नहिं जिंदगी के पन्नों पर।
”राज़” दिल ये तो बता तेरा धड़कना कैसा?
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